23 March 2026

10596 - 10600 दिल पेशा आन सच्चे बच्चे ग़म दर्द अंज़ाम इनाम फ़ूल हँसी पाग़ल लम्स ज़ादू ज़ख़्म शायरी


10596
दिलक़े सब ज़ख़्म,
पेशावर हैं मियाँ;
आन हा आन,
भरते रहते हैं…
                      ज़ौन एलियाँ

10597
ज़ब सच्चे दिलवालोंक़े,
होते बुरे अंज़ाम देख़ें हैं…
ज़ख़्म, ग़म, दर्द, सच्चाईक़ो,
मिलते इनाम देख़ें हैं …ll

10598
हो ग़ए फ़ूल ज़ख़्म-ए-दिल,
ख़िलक़र नहीं ज़ाती,
हँसी नहीं ज़ाती ll
                             ज़लील मानिक़पूरी

10599
इतने ज़ख़्म भी अच्छे नहीं,
हम भी अब बच्चे नहीं l
क़ितना सहे एक़ पाग़ल आदमी भला,
हम झूठे तो तुम भी सच्चे नहीं ll

10600
वो ज़ख़्मक़ा दर्द हो
क़ि वो लम्सक़ा हो ज़ादू…
                                     ज़ावेद अख़्तर

No comments:

Post a Comment