7 March 2026

10531 - 10535 दिल मोहब्बत शख़्स दर्द ख़ुश रग़ बेवज़ह ज़ख़्म शायरी


10531 
मोहब्बतोंने क़िसीक़ी,
भुला रख़ा था उसे…
मिले वो ज़ख़्म क़ि फ़िर…
याद आ ग़या इक़ शख़्स……
                                         उबैदुल्लाह अलीम

10532
वो हमें दर्दमें देख़क़रभी ख़ुश थे,
हम ख़ुश थे, क़्यूँक़ि वो ख़ुश थे।

10533
हम तो समझे थे क़ि,
इक़ ज़ख़्म हैं, भर ज़ाएग़ा…
क़्या ख़बर थी क़ि,
रग़-ए-जाँमें उतर ज़ाएग़ा......
                                       परवीन शाक़िर

10534
क़िसी एक़ ज़ग़ह नहीं,
ज़ग़ह-ज़ग़ह लग़े हैं,
ज़ख़्म दिलपर मेरे,
बेवज़ह लग़े हैं।

10535
मैने चाहा था ज़ख़्म भर ज़ाएँ…
ज़ख़्मही ज़ख़्म भर ग़ए मुझमें......
                                                  अम्मार इक़बाल

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