10566
ज़ो ज़ख़्म बाँटते हैं,
उन्हें ज़ीस्तपें हैं हक़;
मैं फ़ूल बाँटता हूँ,
मुझे मार दिज़िए……
अहमद फ़रहाद
10567
तू बदनाम ना हो,
बस इसी वज़हसे…
इन ज़ख़्मोंक़ा इलज़ाम मैने,
क़िस्मतपर डाल दिया।
10568
तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम,
तिरी दुहाई न दूँ…
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फ़िर भी…
तुझे दिख़ाई न दूँ ll
अहमद फ़राज़
तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम,
तिरी दुहाई न दूँ…
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फ़िर भी…
तुझे दिख़ाई न दूँ ll
अहमद फ़राज़
10569
ज़ख़्मोंक़ी सज़ा,
भले मिली हो मुझे…
पर मोहोब्बतक़ी अदालतमें,
बेक़सूर था मैं।
10570
नमक़क़ी रोज़,
मालिश क़र रहें हैं…
हमारे ज़ख़्म,
वर्ज़िश क़र रहें हैं…
फ़हमी बदायूनी
नमक़क़ी रोज़,
मालिश क़र रहें हैं…
हमारे ज़ख़्म,
वर्ज़िश क़र रहें हैं…
फ़हमी बदायूनी
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