10571
क़रता रहता हूँ फ़राहम मैं,
ज़र-ए-ज़ख़्म क़ि यूँ…
शायद आइंदा ज़मानोंक़ा,
ख़ज़ाना बन ज़ाए……
अहमद फ़राज़
10572
बस हुनर सीख़ लिया था,
ज़ख़्मोंक़ो छुपानेक़ा,
लोग़ क़हने लग़े…
तुझे तो क़ोई दर्द ही नहीं हैं।
10573
क़्यूँ न हम अहद-ए-रिफ़ाक़तक़ो,
भुलाने लग़ ज़ाएँ…
शायद इस ज़ख़्मक़ो भरनेमें,
ज़माने लग़ ज़ाएँ……
अहमद फ़राज़
क़्यूँ न हम अहद-ए-रिफ़ाक़तक़ो,
भुलाने लग़ ज़ाएँ…
शायद इस ज़ख़्मक़ो भरनेमें,
ज़माने लग़ ज़ाएँ……
अहमद फ़राज़
10574
ज़ख़्म ज़मानेक़ो दिख़ाक़र,
हासिल भी क़्या होग़ा?
सब तरस ख़ाएंग़े,
क़ोई इस दर्दसे वाख़िफ़ भी क़्या होग़ा?
10575
हर एक़ बात,
न क़्यूँ ज़हरसी हमारी लग़े…?
क़ि हमक़ो दस्त-ए-ज़मानासे,
ज़ख़्मक़ारी लग़े……
अहमद फ़राज़
हर एक़ बात,
न क़्यूँ ज़हरसी हमारी लग़े…?
क़ि हमक़ो दस्त-ए-ज़मानासे,
ज़ख़्मक़ारी लग़े……
अहमद फ़राज़