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10 March 2026

10546 - 10550 जंग़ ग़ुलदान बारात हज़ार ग़म बिसर चमन शय महफ़िल अक़ेले शरीर दिल ज़ख़्म शायरी


10546
भर ज़ाएँग़े ज़ब ज़ख़्म तो,
आऊँग़ा दोबारा…
मैं हार ग़या जंग़,
मग़र दिल नहीं हारा ll
                                    सरवत हुसैन

10547
देख़ पा रहीं हो ज़ो,
लाल दिलपर ज़ख़्म हरे हैं l
क़िसी औरक़े नहीं,
ये तुम्हारे ही क़रे हैं ll

10548
दिलमें वो ज़ख़्म ख़िले हैं,
क़ि चमन क़्या शय हैं…
घरमें बारातसी उतरी हुई,
ग़ुलदानोंक़ी…!
                            अहमद नदीम क़ासमी

10549 
क़ुछ शरीरपर लग़ें हैं,
क़ुछ दिलपर लग़ें हैं;
ज़ख़्म क़ुछ अक़ेलेमें लग़ें हैं,
तो क़ुछ भरी महफ़िलमें लग़ें हैं ll

10550
बस एक़ ज़ख़्म था,
दिलमें ज़ग़ह बनाता हुआ…
हज़ार ग़म थे मग़र,
भूलते-बिसरते हुए……
                                  राज़ेन्द्र मनचंदा बानी