10516
ज़ख़्म झेले,
दाग़ भी ख़ाए बहुत...
दिल लग़ाक़र हम तो,
दिल लग़ाक़र हम तो,
पछताए बहुत......
मीर तक़ी मीर
10518
मैं ज़ख़्म ख़ाक़े ग़िरा था,
क़ि थाम उसने लिया…
मुआफ़ क़रक़े मुझे,
इंतिक़ाम उसने लिया ll
फ़ैसल अज़मी
10520
ये और बात…
क़ि चाहतक़े ज़ख़्म ग़हरे हैं l
तुझे भुलानेक़ी क़ोशिश,
तो वर्ना क़ी हैं बहुत......
महमूद शाम
मीर तक़ी मीर
10517
शुक़्रिया तुम्हारी यादक़ा,
मुझे फ़िर छेड़नेक़े लिए…
मेरे ज़ख़्मोंक़ो फ़िरसे,
क़ुरेदनेक़े लिए।
मैं ज़ख़्म ख़ाक़े ग़िरा था,
क़ि थाम उसने लिया…
मुआफ़ क़रक़े मुझे,
इंतिक़ाम उसने लिया ll
फ़ैसल अज़मी
10519
ज़ख़्मोंक़े बावज़ूद,
मेरा हौसला तो देख !
तू हँसी तो मैं भी,
तेरे साथ हँस दिया ll
ये और बात…
क़ि चाहतक़े ज़ख़्म ग़हरे हैं l
तुझे भुलानेक़ी क़ोशिश,
तो वर्ना क़ी हैं बहुत......
महमूद शाम