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13 February 2026

10426 - 10430 अरमान ज़ल्वा परवरदिग़ार चाँद तारे क़हक़शाँ आँख़ शाम फ़ुसूँ दर्द मंज़ूर ख़्वाहिश ज़न्नत हराम दीद शायरी


10426
क़िया क़लीमक़ो,
अरमान-ए-दीदने रुस्वा ;
दिख़ाक़े ज़ल्वा-ए-परवरदिग़ार,
थोड़ासा ll
                                  शब्बर ज़ीलानी क़मरी

10427
तुम अपने चाँद, तारे, क़हक़शाँ,
चाहे ज़िसे देना…
मेरी आँख़ोंपें अपनी दीदक़ी.
इक़ शाम लिख़ देना......
ज़ुबैर रिज़वी

10428
तिरी पहली दीदक़े साथ ही,
वो फ़ुसूँ भी था l
तुझे देख़क़र तुझे देख़ना,
मुझे आ ग़या......!!
                                     इक़बाल क़ौसर

10429
दर्दक़े मिलनेसे,
ऐ यार बुरा क़्यूँ माना...
उसक़ो क़ुछ और,
सिवा दीदक़े मंज़ूर न था......
ख़्वाज़ा मीर दर्द

10430
ज़ो और क़ुछ हो,
तेरी दीदक़े सिवा मंज़ूर l
तो मुझपें ख़्वाहिश-ए-ज़न्नत,
हराम हो ज़ाए ll
                                       हसरत मोहानी