उम्रभर मिलने नहीं देती हैं,
अब तो रंज़िशें...
वक़्त हमसे रूठ ज़ानेक़ी,
वक़्त हमसे रूठ ज़ानेक़ी,
अदातक़ ले ग़या ll
4147
मिटानेकी कोशिश,
तुमने भी की, हमने भी की...
हमने फासला और,
तुमने
हमारा वजूद...
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राख होता हुआ
वजूद,
मुझसे थककर
सवाल करता हैं;
मुहब्बत
करना तेरे लिए,
इतना ही जरुरी
था क्या...?
4149
सुनो,
बार बार इस तरह,
रुबरु न हुआ क़रो...
हम होशमें नहीं रहते,
तुमसे मिलनेक़े बाद...!
4150
कभी शब्दोमें तलाश,
न करना वजूद मेरा;
मैं उतना लिख नही पाता,
जितना मेहसूस करता हूँ...!