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31 December 2025

10226 - 10230 उलझ तौबा दाम रहमत इल्ज़ाम बहार क़फ़स बेताब ज़ख़्म रास्ते दिल हूबहू तड़प शायरी


10226
क़हर ढाएग़ी असीरोंक़ी तड़प,
औरभी उलझेंग़े हल्क़े दामक़े...
                                              हफ़ीज़ जौनपुरी

10227
तड़पक़र मैने तौबा तोड़ ड़ाली,
तिरी रहमतपें इल्ज़ाम आ रहा था
अब्दुल हमीद अदम

10228
तड़पक़े रह ग़ई,
बुलबुल क़फ़समें ऐ सय्याद ;
ये क़्या क़हा क़ि,
अभी तक़ बहार बाक़ी हैं ll
                                  बेताब अज़ीमाबादी

10229
सोयी हुई तड़पक़ो,
फ़िरसे ज़ग़ा रहा हैं l
क़हता तो क़ुछ नहीं हैं,
बस याद आ रहा हैं ll
फ़रीहा नक़वी

10230
तड़प रहा हैं,
जो बेताब होक़े ज़ख़्मोंसे...
ये रास्तेमें मिरे,
दिलक़े हूबहू क़्या हैं...?
                  शाद फ़िदाई देहलवी