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6 October 2018

3381 - 3385 क़लम जुदाई बदौलत छोड़ इश्क मोहब्बत दर्द वाकिफ़ जज्बात हिदायत दफ्तर कलम शायरी


3381
क़लममें ज़ोर जितना हैं,
जुदाईकी बदौलत हैं l
मिलनके बाद लिखनेवाले,
लिखना छोड़ देते हैं ll
                        शुजा ख़ावर


3382
इस कदर वाकिफ़ हैं,
मेरी कलम, मेरे जज़्बातोंसे;
अगर मैं 'इश्कलिखना भी चाहूँ...
तो तेरा नाम लिखा जाता हैं !!!


3383
कैसे कह दूँ अपनी कलमसे,
कि रोना बंद कर दे...
मोहब्बतकी हैं जनाब,
दर्द फूटफूटकर निकलेंगे...

3384
इश्क़ होना भी लाज़मी हैं,
शायरी लिखनेके लिए...
वरना... कलम ही लिखती,
तो हर दफ्तरका बाबू, ग़ालिब होता.......!

3385
आज फिरसे कलम,
हिदायत दे रहीं हैं दर्द ना लिखनेकी...
लगता ये भी थक गई हैं,
मेरा दर्द छुपाते- छुपाते.......!