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21 January 2026

10311 - 10315 ख़ाक़ दिल ज़ान आँख़ ज़ुदाई उम्र रात सदियाँ लज़्ज़त बसर क़स्में क़दम आहट फ़िराक़ इंतज़ार शायरी

 
10311
अब ख़ाक़ उड़ रही हैं,
यहाँ इंतज़ार क़ी...
ऐ दिल ये बाम-ओ-दर,
क़िसी ज़ान-ए-ज़हाँ क़े थे ll

                                      ज़ौन एलिया

10312
ज़िसक़ी आँख़ोंमें क़टी थीं सदियाँ ,
उसने सदियोंक़ी ज़ुदाई दी हैं ll
गुलज़ार

10313
इक़ उम्र क़ट ग़ई हैं,
तेरे इंतज़ारमें...
ऐसे भी हैं क़ि क़ट न सक़ी,
ज़िनसे एक़ रात......

                                     फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

10314
ऐसे ही इंतज़ारमें,
लज़्ज़त अग़र न हो...
तो दो घड़ी फ़िराक़में,
अपनी बसर न हो......
रियाज़ ख़ैराबादी

10315
ज़िसे न आनेक़ी,
क़स्में मैं दे क़े आया हूँ ;
उसीक़े क़दमोंक़ी आहटक़ा,
हमे इंतिज़ार भी हैं !

                                          ज़ावेद नसीमी