1981
पूछा जब उन्होंने,
लिखने लगे कबसे ज़नाब,
कहाँ आँखें आपकी,
लगने लगी जबसे शराब।
1982
" दूरियों " का ग़म नहीं
अगर " फ़ासले " दिलमें
न हो।
" नज़दीकियाँ " बेकार हैं,
अगर जगह दिलमें ना हो।
1983
जिंदगीसे कोई चीज़,
उधार नहीं मांगी मैंने ...
कफ़न भी लेने गए तो,
जिंदगी अपनी देकर . . . !
1984
मैं भी हुआ करता था वकील,
इश्क वालोंका कभी.......
नज़रें उससे क्या मिलीं...
आज खुद कटघरेमें हूँ मैं...!!
1985
यही काग़ज़ यही क़लम होगा,
रोज़ इक वाक़िआ' रक़म होगा l
सबिहा ख़ान