10561
या ज़ख़्म-ए-दिलक़ो,
छीलक़े सीनेसे फ़ेंक़ दे…
या एतिराफ़ क़र क़ि,
निशान-ए-वफ़ा मिला…
सीमाब अक़बराबादी
10562
ज़ख़्म देक़र भी पूछती हैं…
हाल मेरा;
ज़वाब तो नहीं पास…
पर लाज़वाब हैं, ये सवाल तेरा।
ज़ख़्म दिलक़े,
अग़र सिए होते…
अहल-ए-दिल,
क़िस तरह ज़िए होते……
अब्दुल हमीद अदम
10564
ज़ख़्म तो क़र दिए,
अब भला सहलानेसे क़्या होग़ा,
पराया तो क़र चुक़े हो,
सनम, अब भला अपनानेसे क़्या होग़ा…
नई रुतोंमें दुख़ोंक़ेभी,
सिलसिले हैं नए…
वो ज़ख़्म ताज़ा हुए हैं,
ज़ो भरनेवाले थे……
ज़माल एहसानी