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12 March 2026

10556 - 10560 दिल मज़रूह हवा नज़र निशाँ बेहतर ग़ज़ल नमक़ क़ीमत सस्ती ग़हरा मिज़ाज़ ज़ख़्म शायरी

 
10556
क़िस नज़रसे आपने देख़ा,
दिल-ए-मज़रूहक़ो l
ज़ख़्म ज़ो क़ुछ भर चले थे,
फ़िर हवा देने लग़े ll
                                   साक़िब लख़नवी

10557
क़ुछ ज़ख़्म,
अंदरतक़ तोड़ ज़ाते हैं…
भर तो ज़ाते हैं पर…
निशाँ छोड़ ज़ाते हैं…!

10558
फ़ुलाँसे थी ग़ज़ल,
बेहतर फ़ुलाँक़ी…
फ़ुलाँक़े ज़ख़्म अच्छे थे,
फ़ुलाँसे……
                                  ज़ौन एलिया

10559
नमक़क़ी क़ीमत,
सस्ती हैं बहुत;
लोग़ ख़ाते क़ाम,
छिड़क़ते ज़्यादा हैं।

10560
इक़ ज़ख़्म मुझक़ो चाहिए,
मेरे मिज़ाज़क़ा…
यानी हरा भी चाहिए,
ग़हरा भी चाहिए…
                                           ज़व्वाद शैख़