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17 June 2026

10956 - 10960 दिल क़ाँटा ज़िक़्र इब्तिदा इंतिहा दुनियाँ आज़ाद बातें ग़म फ़िक़्र शायरी


10956
ज़ो सामने ज़िक़्र नहीं क़रते,
वो अंदर हीं अंदर,
बहुत फ़िक़्र क़रते हैं !

10957
ख़िरद-मंदोंसे क़्या पूछूँ क़ि,
मेरी इब्तिदा क़्या हैं…?
क़ि मैं इस फ़िक़्रमें रहता हूँ,
मेरी इंतिहा क़्या हैं…?
अल्लामा इक़बाल

10958
हमें तो लग़ा था क़े,
तुम्हें बड़ी फ़िक़्र होग़ी हमारी…
पर असलमें हमारे अलावा,
सारी दुनियाँ हैं तुम्हारी।

10959
आज़ाद फ़िक़्रसे हूँ,
उज़्लतमें दिन गुज़ारूँ…
दुनियाँके ग़मक़ा,
दिलसे क़ाँटा निक़ल गया हो ll
अल्लामा इक़बाल

10960
ज़ी चाहें क़ि दुनियाँक़ी,
हर एक़ फ़िक़्र भुलाक़र,
दिलक़ी बातें सुनाऊँ तुझे,
मैं पास बिठाक़र।