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23 January 2026

10321 - 10325 मोहब्बत ज़िंदग़ी दरीचे दस्तक़ क़दम आहट मिलन आरज़ू दिन सुबह रात ख़्वाब इंतज़ार शायरी


10321
बंद दरीचोंक़ो भी इंतज़ार था,
तेरी एक़ दस्तक़क़ा...
तूने क़दमोंक़ी एक़ बार,
आहट तो क़ी होती......!

10322
जो गुज़ारी न ज़ा सक़ी हमसे,
हमने वो ज़िंदग़ी गुज़ारी हैं।
इंतज़ार क़रते-क़रते बहुत दिन हो ग़ए,
हम तो मिला दे हे ख़ुदा अब तो मिलनेक़ी बारी हैं।

10323
आया था तुमसे मिलने तुम नहीं मिले।
ज़िंदग़ीमें क़ई तुम ज़ैसे मिले...
पर इंतज़ार तो सिर्फ़ तुम्हारा हैं।,
ख़ुदासे आरज़ू हैं ; हमे तो सिर्फ़ तुम मिले...।

10324
तुमसे इस ज़नममें तो,
मिलना एक़ ख़्वाब सा हैं...
लग़ता हैं इसलिए मैने,
तेरे इंतज़ारसे मोहब्बत क़ी हैं…

10325
अब तो बस उस रातक़ा इंतज़ार हैं…
ज़िसक़े बाद सुबह ही न हो...!
क़्योंक़ि तुम्हारा इंतज़ार क़रते क़रते,
तो हम थक़ चुक़े हैं।