Showing posts with label वहम ज़माल क़ाबिल मयस्सर फ़ुर्सत ज़ल्वा हुस्न बेपनाह नज़र दीदार अश्क़ शायरी. Show all posts
Showing posts with label वहम ज़माल क़ाबिल मयस्सर फ़ुर्सत ज़ल्वा हुस्न बेपनाह नज़र दीदार अश्क़ शायरी. Show all posts

16 February 2026

10441 - 10445 वहम ज़माल क़ाबिल मयस्सर फ़ुर्सत आँख़ शौक़ ज़ल्वा हुस्न बेपनाह नज़र दीदार वज़ू अश्क़ शायरी


10441
वहम ये तुझक़ो अज़ब हैं,
ऐ ज़माल-ए-क़म-नुमा...
ज़ैसे सब क़ुछ हो मगर,
तू दीदक़े क़ाबिल न हो......
                                     मुनीर नियाज़ी

10442
शायद तुम्हारी दीद,
मयस्सर न हो क़भी...
आओ क़ि तुमक़ो देख़लें,
फ़ुर्सतसे आज़ हम......!!

10443
आँख़ चुरा रहा हूँ मैं,
अपने ही शौक़-ए-दीदसे...
ज़ल्वा-ए-हुस्न-ए-बेपनाह,
तूने ये क़्या दिख़ा दिया......
                                      फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

10444
दीदक़े क़ाबिल हसीं,
तो हैं बहुत...
हर नज़र दीदारक़े,
क़ाबिल नहीं......
ज़लील मानिक़पूरी

10445 
मुद्दतों आँख़ें,
वज़ू क़रती रहीं अश्क़ोंसे l
तब क़हीं ज़ाक़े,
तिरी दीदक़े क़ाबिल हुआ मैं ll
                                   इरशाद ख़ान सिकंदर