10441
वहम ये तुझक़ो अज़ब हैं,
ऐ ज़माल-ए-क़म-नुमा...
ज़ैसे सब क़ुछ हो मगर,
तू दीदक़े क़ाबिल न हो......
मुनीर नियाज़ी
वहम ये तुझक़ो अज़ब हैं,
ऐ ज़माल-ए-क़म-नुमा...
ज़ैसे सब क़ुछ हो मगर,
तू दीदक़े क़ाबिल न हो......
मुनीर नियाज़ी
10442
शायद तुम्हारी दीद,
मयस्सर न हो क़भी...
आओ क़ि तुमक़ो देख़लें,
फ़ुर्सतसे आज़ हम......!!
10443
आँख़ चुरा रहा हूँ मैं,
अपने ही शौक़-ए-दीदसे...
ज़ल्वा-ए-हुस्न-ए-बेपनाह,
तूने ये क़्या दिख़ा दिया......
फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी
आँख़ चुरा रहा हूँ मैं,
अपने ही शौक़-ए-दीदसे...
ज़ल्वा-ए-हुस्न-ए-बेपनाह,
तूने ये क़्या दिख़ा दिया......
फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी
10444
दीदक़े क़ाबिल हसीं,
तो हैं बहुत...
हर नज़र दीदारक़े,
क़ाबिल नहीं......
ज़लील मानिक़पूरी
10445
मुद्दतों आँख़ें,
वज़ू क़रती रहीं अश्क़ोंसे l
तब क़हीं ज़ाक़े,
तिरी दीदक़े क़ाबिल हुआ मैं ll
इरशाद ख़ान सिकंदर
मुद्दतों आँख़ें,
वज़ू क़रती रहीं अश्क़ोंसे l
तब क़हीं ज़ाक़े,
तिरी दीदक़े क़ाबिल हुआ मैं ll
इरशाद ख़ान सिकंदर
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