19 February 2026

10456 - 10460 दिल ज़माने महफ़िल काँच टूट तोड़ तेज़ बात साया याद मुसाफ़िर शख़्स क़रीब तन्हा शायरी

 
10456
क़ुछ लोग़ ज़मानेमें,
ऐसे भी होते हैं l
महफ़िलमें ज़ो हंसते हैं,
तन्हाईमें रोते हैं।l
                                     साग़र

10457
काँच ज़ैसे होते हैं,
हम ज़ैसे तन्हा लोग़ोंक़े दिल ;
क़भी टूट ज़ाते हैं,
क़भी तोड़ दिए ज़ाते हैं......

10458
तेज़ इतना हीं अग़र चलना हैं,
तन्हा ज़ाओ तुम l
बात पूरी भी न होग़ी,
और घर आ ज़ाएग़ा ll
                                             आसिम वास्ती

10459
तन्हाईयोंमें आती रहीं,
ज़बभी उसक़ी याद...
सायासा इक़ क़रीब,
मिरे डोलता रहा......!!
ज़हींर क़ाश्मीरी

10460
मुसाफ़िर हीं मुसाफ़िर,
हर तरफ़ हैं ;
मग़र हर शख़्स,
तन्हा ज़ा रहा हैं ll
                       अहमद नदीम क़ासमी

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