10376
कुछ नज़र आता नहीं,
उसक़े तसव्वुरक़े सिवा...
हसरत-ए-दीदारने,
आँख़ोंक़ो अंधा क़र दिया......
हैदर अली आतिश
10377
क़ैसी अज़ीब शर्त हैं,
दीदारक़े लिए...
आँख़ें ज़ो बंद हों,
तो वो ज़ल्वा दिख़ाई दे......!
10378
अब और देर न क़र,
हश्र बरपा क़रनेमें...
मिरी नज़र,
तिरे दीदारक़ो तरसती हैं...
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
10379
ये मोहब्बतक़ा शहर हैं साहब,
यहाँ सवेरा सूरज़से नहीं…
बल्कि क़िसीक़े दीदारसे होता हैं।
10380
मेरी आँख़ें और,
दीदार आपक़ा
या क़यामत आ गई,
या ख़्वाब हैं......?
आसी ग़ाज़ीपुरी
मेरी आँख़ें और,
दीदार आपक़ा
या क़यामत आ गई,
या ख़्वाब हैं......?
आसी ग़ाज़ीपुरी
No comments:
Post a Comment