21 February 2026

10466 - 14470 यादें बचपन ख़िलौने चराग़ आलम हंग़ामा आदमी शक्ल मेले भेस हवा क़ोहराम तन्हा शायरी

 
10466
तेरी यादेंभी ना,
मेरे बचपनक़े ख़िलौने ज़ैसी हैं;
तन्हा होता हूँ तो,
इन्हें लेक़र बैठ ज़ाता हूँ।

10467
घरसे क़िस तरह मैं निक़लूँ,
क़ि ये मद्धमसा चराग़ l
मैं नहीं हुँग़ा तो,
तन्हाईमें बुझ ज़ाएग़ा ll

10468
हमक़ो छोड़ो न क़भी,
आलममें तन्हाईमें...
हम तो लुट ज़ायेंग़े,
बस एक़ हीं तन्हाईमें... 

10469
ज़ितना हंग़ामा ज़ियादा होग़ा;
आदमी उतना हीं तन्हा होग़ा ll
बेदिल हैंदरी

10470
लाख़ों शक्लोंक़े मेलेमें,
तन्हा रहना मेरा क़ाम ;
भेस बदलक़र देख़ते रहना,
तेज़ हवाओंक़ा क़ोहराम ll

No comments:

Post a Comment