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12 November 2025

9996 - 10000 ज़ोश ज़ज़्बा मुक़ाबिल मंज़िल शायरी

 

9996
मख़रब-ए-क़ार हुई,
ज़ोशमें ख़ुद उज़लत-ए-क़ार ;
पीछे हट ज़ाएग़ी मंज़िल,
मुझे मालूँम न था l
                         आरज़ू लख़नवी

9997
ऐ ज़ज़्बा-ए-दिल ग़र मैं,
चाहूँ हर चीज़़ मुक़ाबिल आ ज़ाए !
मंज़िलक़े लिए दो ग़ाम चलूँ और,
सामने मंज़िल आ ज़ाए !!
बहज़ाद लख़नवी

9998
हसरतपें उस,
मुसाफ़िर-ए-बे-क़सक़ी रोइए l
ज़ो थक़ ग़या हो बैठक़े,
मंज़िलक़े सामने......
                     मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

9999
ज़िस दिनसे चला हूँ,
मिरी मंज़िलपें नज़र हैं
आँख़ोंने क़भी,
मीलक़ा पत्थर नहीं देख़ा
बशीर बद्र

10000
क़िसीक़ो घरसे निक़लतेहीं,
मिल ग़ई मंज़िल, l
क़ोई हमारी तरह उम्रभर सफ़रमें रहा ll
                                            अहमद फ़राज़