7 November 2026

11601 - 11605 ज़हाँ मश्रिक़ मग़रिब दौर लौट आग़ाज़ हसरत हक़ीक़त सवाल अफ़्साना ख़ामोशी महक़ महफ़िल ज़िक्र बज़्म अंदाज़ शायरी

 
11601
उठ क़ि अब,
बज़्म-ए-ज़हाँक़ा और ही अंदाज़ हैं 
l
मश्रिक़-ओ-मग़रिबमें,
तेरे दौरक़ा आग़ाज़ हैं 
ll
                                                        अल्लामा इक़बाल

11602
फ़िर तिरी बज़्म-ए-हसींमें,
लौटक़र आऊँग़ा मैं…l
आऊँग़ा मैं और,
ब-अंदाज़-ए-दिग़र आऊँग़ा मैं…ll
असरार-उल-हक़ मज़ाज़

11603
बज़्ममें देख़क़े,
हसरतसे क़िसी क़ो चुप हूँ…
दर-हक़ीक़त यही,
अंदाज़-ए-सवाल अच्छा हैं…
ll
                                       मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़

11604
'बेदम' इस अंदाज़से,
क़ल यूँ हमने क़ही अपनी बीती…
हर एक़ने समझा,
महफ़िलमें ये मेरा ही अफ़्साना था ll
बेदम शाह वारसी

11605
ज़रूरी नहीं कि हर बार,
उनका नाम लिया जाए, 
मेरी ख़ामोशीमें भी उनकी महक़,
और महफ़िलमें उनका ही ज़िक्र होता हैं।

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