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8 November 2017

1921 - 1925 दिल पसंद मतलबी दुनियाँ मुकद्दर मोहब्बत क़द्र अधूरी कहानियाँ मजबूर साँस शामिल मुक़म्मल दुवा शायरी


1921
मैने खुदासे पुछा...
कि क्यूँ तू हर बार छीन लेता हैं...
“मेरी हर पसंद ”
वो हंसकर बोला,
“मुझेभी पसंद हैं, तेरी हर पसंद..!!"

1922
मतलबी दुनियाँके लोग खड़े हैं,
हाथोंमें पत्थर लेकर।
मैं कहाँ तक भागू,
शीशेका मुकद्दर लेकर।

1923
अधूरी हैं तो अधूरी हीं रहने दो,
मोहब्बत मेरी...
ज़ो हो ज़ायेग़ी मुक़म्मल,
तो शायरीक़ी क़द्र ना होग़ी...!


1924
वो दिन कभी मत दिखाना प्रभु,
के मुझे अपने आपपर गुरुर हो जाये,
रखना मुझे इस तरह सबके दिलोंमें,
के हर कोई दुवा देनेको मजबूर हो जाये l

1925
साँसोंकी तरह...
तुम भी... शामिल हो मुझमें...
रहते भी साथ हो...
और... ठहरते भी नहीं.......!