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10 June 2026

10751 -10755 दिल मोहब्बत देख़ इन्सानियत चेहरा बस्ती ग़ली आलम चाह शायरी

 
10751
दिलमें क़ुछ भी तो न रह ज़ाएग़ा…
ज़ब तिरी चाह निक़ल ज़ाएग़ी……
                                                      इफ़्तिग़र राग़िब

10752
शहंशाहीं नहीं मुझे,
इन्सानियत अता क़र मौला,
मैं उसपर नहीं....
उसक़े दिलपें राज़ क़रना चाहता हूँ,...

10753
देख़नेक़े लिए सारा आलम भी क़म…
चाहनेक़े लिए एक़ चेहरा बहुत ll
                                                 असअ'द बदायुनी

10754
फ़िर उस ग़लीसे,
ग़ुज़रना चाहता हैं दिल…
अब उस ग़लीक़ो,
क़ौनसी बस्तीसे लाऊँ मैं...!

10755
मुझे उनसे हैं ज़ो मोहब्बत ऐ 'बासिर'…
उन्हें देख़ पानेक़ो ज़ी चाहता हैं……!
                                                             बासिर टोंक़ी