10241
तड़प हीं तड़प रह ग़ई,
सिर्फ़ बाक़ी...
ये क़्या ले लिया,
मेरे पहलूसे तूने...?
मुज़्तर ख़ैराबादी
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क़ुंज़-ए-क़फ़स दिया हैं,
तो इतनी सक़त भी दे ;
तोड़ें तड़प तड़पक़े,
हर इक़ बाल-ओ-परक़ो हम !
नज़ीर हुसैन सिद्दीक़ी
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आख़िर तड़प तड़पक़े,
ये ख़ामोश हो ग़या...
दिलक़ो सुक़ून मिल ही गया,
इज़्तिराबमें l
साहिर होशियारपुरी
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फ़िर उसे अपनी,
हर बेरुख़ी याद आए...
तड़प तड़पक़े वो,
नाम मेरा दोहराए...
मुअज़्ज़मा नक़वी
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मैं ढूँढता हूँ क़िसे,
बार-बार क़्या क़हिए ?
तड़प तड़पक़े शब-ए-इंतिज़ार,
क़्या क़हिए......!
क़ाज़ी ज़लाल हरीपुरी