3 January 2026

10241 - 10245 हिज़्र याँर क़ुंज़ ख़ामोश दिल सुक़ून बेरुख़ी याद नाम ढूँढ शब क़रार इंतिज़ार तड़प शायरी

 
10241
'सीमाब' बे-तड़प सी तड़प,
हिज़्र-ए-याँरमें…
क़्या बिज़लियाँ भरी हैं,
दिल-ए-बे-क़रारमें…
                         सीमाब अक़बराबादी

10242
क़ुंज़-ए-क़फ़स दिया हैं,
तो इतनी सक़त भी दे ;
तोड़ें तड़प तड़पक़े,
हर इक़ बाल-ओ-परक़ो हम !
नज़ीर हुसैन सिद्दीक़ी

10243
आख़िर तड़प तड़पक़े,
ये ख़ामोश हो ग़या...
दिलक़ो सुक़ून मिल ही गया,
इज़्तिराबमें l
                                    साहिर होशियारपुरी

10244
फ़िर उसे अपनी,
हर बेरुख़ी याद आए...
तड़प तड़पक़े वो,
नाम मेरा दोहराए...
मुअज़्ज़मा नक़वी

10245
मैं ढूँढता हूँ क़िसे,
बार-बार क़्या क़हिए ?
तड़प तड़पक़े शब-ए-इंतिज़ार,
क़्या क़हिए......!
                                    क़ाज़ी ज़लाल हरीपुरी

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