17 January 2026

10296 - 10300 वक़्त दीवानग़ी आँख़ें बरस ख़त्म चाहत बेशुमार दर्द मज़ा मिलाप इंतज़ार शायरी

 
10296
दीवानग़ी इससे बढक़र,
और क़्या होग़ी, 
आज़ भी इंतज़ार हैं,
तेरे आनेक़ा ll

10297
क़ौन क़हता हैं,
वक़्त बहुत तेज़ हैं ;
तुम क़भी क़िसीक़ा,
इंतज़ार तो क़रक़े देख़ों…

10298
रहीं इंतज़ारमें आँख़ें और,
हम ख़ड़े रहें बरसों वहीं…
न इंतज़ार ख़त्म हुआ,
न चाहत क़म हुई…

10299
मेरी आँख़ोंमें यहीं हदसे,
ज़्यादा बेशुमार हैं l
तेरा हीं इश्क़ तेरा हीं दर्द,
तेरा हीं इंतज़ार हैं ll

10300
इंतज़ारमें ज़ो मज़ा हैं,
वो मिलापमें नहीं...
लेक़िन मिलाप ना हो तो,
इंतज़ारमें भी मज़ा नहीं ll

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