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31 March 2026

10626 - 10630 इलाज़ ग़हरे वक़्त तसव्वुर शिक़ायत भूल ज़राहत क़तरा महताब रात घाव दिल ज़ख़्म शायरी

 

10626
हमने इलाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो,
ढूँड़ लियाँ लेक़िन…
ग़हरे ज़ख़्मोंक़ो भरनेमें,
वक़्त तो लग़ता हैं……
                                                हस्तीमल हस्ती

10627
न वो नशात-ए-तसव्वुर,
क़ि लो तुम आ ही ग़ए…
न ज़ख़्म-ए-दिलक़ी हैं सोज़िश,
क़ोई ज़ो सहनी हो……
ज़ौन एलियाँ

10628
वो फ़िर मोटरसे टक्करक़ी,
शिक़ायत भूल ज़ाएग़ी…
वो ज़ख़्म-ए-दिलक़े आग़े,
हर ज़राहत भूल ज़ाएग़ी……!
                                           ज़रीफ़ ज़बलपूरी

10629
ज़ख़्म-ए-दिलमें नहीं हैं,
क़तरा-ए-ख़ूँ…
ख़ूब हमने दिख़ाक़े,
देख़ लियाँ……
दाग़ देहलवी

10630
ये महताब ये रातक़ी,
पेंशानीक़ा घाव;
ऐसा ज़ख़्म तो दिलपर,
ख़ायाँ ज़ा सक़ता हैं ll
                             अब्बास ताबिश