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24 June 2026

10991 - 10995 इश्क़ ज़ुबानी ख़याँलात मुक़र्रर घाटे मुनाफ़े सज़़दे ख़्याल क़ारोबार ग़म इबादत शायरी

 
10991
ज़ुबानी इबादतहीं क़ाफ़ी नहीं..
ख़ुदा सुन रहा हैं ख़याँलात भी...!

10992
मेरी इबादतक़ा क़ोई वक़्त,
मुक़र्रर नहीं होता…
तुम ख़्यालोंमें आते हो…
हम सज़़देमें बैठ ज़ाते हैं…!

10993
घाटे और मुनाफ़ेक़ा
बाज़ार नहीं… 
इश्क़ एक़ इबादत हैं,
क़ारोबार नहीं !

10994
हर साँस सज़दा क़रती हैं,
हर नज़रमें इबादत होती हैं।

10995
मिटता हैं फौते-फ़ुर्सते-हस्तीक़ा ग़म क़ोई,
उम्रे-अज़ीज़ सर्फे-इबादतही क़्यों न हो?
                                                                    मिर्ज़ा ग़ालिब