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20 March 2026

10581 - 10585 दिल चाराग़र क़ाफ़ूर शर्मिंदा मरहम नश्तर दस्त ग़ैर समझ लज़्ज़त दवा सोज़न ज़ख़्म शायरी


10581
चाराग़र यूँ तो बहुत हैं,
मग़र ऐ ज़ान-ए-'फ़राज़'…
ज़ुज़ तिरे और क़ोई,
ज़ख़्म न ज़ाने मेरे……
                                  अहमद फ़राज़

10582
ज़ो रक़्ख़े चाराग़र क़ाफ़ूर दूनी,
आग़ लग़ ज़ाए…
क़हीं ये ज़ख़्म-ए-दिल,
शर्मिंदा-ए-मरहम भी होते हैं ll
दाग़ देहलवी

10583
नश्तर-ब-दस्त शहरसे,
चाराग़रीक़ी लौ…
ऐ ज़ख़्म-ए-बे-क़सी,
तुझे भर ज़ाना चाहिए…
                                   परवीन शाक़िर

10584
ज़ख़्म सिलवानेसे,
मुझपर चारा-ज़ुईक़ा हैं तान…
ग़ैर समझा हैं क़ि लज़्ज़त,
ज़ख़्म-ए-सोज़नमें नहीं……
मिर्ज़ा ग़ालिब

10585
एक़ ये ज़ख़्म ही क़ाफ़ी हैं,
मिरे ज़ीनेक़ो…
चाराग़र ठीक़ न होनेक़ी,
दवा दे मुझक़ो ll
                                       बालमोहन पांडेय