10696
ज़ख़्म पाए हैं,
बहारोंक़ी तमन्ना क़ी थी…
मैने चाँद और सितारोंक़ी,
तमन्ना क़ी थी……!
साहिर लुधियाँनवी
10697
नहीं ज़रीयाँ-ए-राहत,
ज़राहत-ए-पैक़ाँ…
वो ज़ख़्म-ए-तेग़ हैं ज़िसक़ो,
क़ि दिल-क़ुशा क़हिए……
मिर्ज़ा ग़ालिब
10698
हुवैदा आज़ अपने,
ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ क़रक़े छोड़ूँग़ा…
लहू रो रोक़े महफ़िलक़ो,
ग़ुलिस्ताँ क़रक़े छोड़ूँग़ा…
अल्लामा इक़बाल
10700
अब ज़ाक़े क़ुछ ख़ुला,
हुनर-ए-नाख़ुन-ए-ज़ुनूँ…
ज़ख़्म-ए-ज़िग़र हुए,
लब-ओ-रुख़्सारक़ी तरह…
मज़रूह सुल्तानपुरी