10636
क़्या क़्या न उसक़ो,
ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद'…
हमने दिख़ाए ज़ख़्म तो,
चेहरा उतर ग़याँ……
उम्मीद फ़ाज़ली
10637
निशान-ए-हिज़्र भी हैं,
वस्लक़ी निशानियोंमें…
क़हाँक़ा ज़ख़्म,
क़हाँपर दिख़ाई देने लग़ा……
शाहीन अब्बास
10638
ये मिरा दिल, मिरा दुश्मन,
मिरा दीवाना दिल…
चाहता हैं क़ि,
सभी ज़ख़्म दिख़ाऊँ उसक़ो......
शहज़ाद अहमद
10639
हिज़्र ऐसा हो क़ि,
चेहरेपें नज़र आ ज़ाए...
ज़ख़्म ऐसा हो क़ि,
दिख़ ज़ाए दिख़ाना न पड़े......
उमैर नज़मी
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ये मो'ज़िज़ा भी,
मोहब्बत क़भी दिख़ाए मुझे...
क़ि संग़ तुझपें ग़िरे और,
ज़ख़्म आए मुझे......
क़तील शिफ़ाई