2171
मेरे क़िसी अफ़सानेक़ो पढ़ने क़ी...!
हम तो क़िताबोंक़ी तर
बिक़ते रहें तेरे शहरमें...!
2172
लहजा शिकायतका था,
मगर. . . . . . .
सारी महफ़िल समझ गई,
मामला मोहब्बतका हैं...
2173
हम तो दर्द लेकर भी,
याद करते हैं,
और लोग दर्द देकर भी
भूल जाते हैं . . . !
2174
मैने दिलको भी सिखा दिया हैं,
हुनर हदमें रहनेका;
वरना हरपल ज़िद करता था,
तेरी पनाहमें रहनेकी. . .
2175
हँसते रहनेकी आदत भी,
कितनी महँगी पड़ी हमें...
छोड़ गई वो ये सोच कर कि...
हम दूर रहकर भी खुश हैं.....