4 January 2018

2171 - 2175 दिल मोहब्बत याद वक़्त अफ़साने मामला फुर्सत महफ़िल लहजा शिकायत क़िताब दर्द हुनर पनाह आदत महँगी शायरी



2171
तुझे हीं फुर्सत न मिली,
मेरे क़िसी अफ़सानेक़ो पढ़ने क़ी...!
हम तो क़िताबोंक़ी तर
बिक़ते रहें तेरे शहरमें...!

2172
लहजा शिकायतका था,
मगर. . . . . . .
सारी महफ़िल समझ गई,
मामला मोहब्बतका हैं...

2173
हम तो दर्द लेकर भी,
याद करते हैं,
और लोग दर्द देकर भी
भूल जाते हैं . . . !

2174
मैने दिलको भी सिखा दिया हैं,
हुनर हदमें रहनेका;
वरना हरपल ज़िद करता था,
तेरी पनाहमें रहनेकी. . .

2175
हँसते रहनेकी आदत भी,
कितनी महँगी पड़ी हमें...
छोड़ गई वो ये सोच कर कि...
हम दूर रहकर भी खुश हैं.....

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