क़ाम सेहतसे न हैं,
क़ुछ चाराग़रक़ी एहतियाज़…
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़रक़ो हैं,
नमक़-दाँ से ग़रज़…ll
सय्यद मसूद हसन मसूद
10692
ज़िंदग़ीक़ो ज़ख़्मक़ी लज़्ज़तसे,
मत महरूम क़र…
रास्तेक़े पत्थरोंसे,
ख़ैरियत मालूम क़र ll
राहत इंदौरी
10693
शक़ हो ग़याँ हैं,
सीना ख़ुशा लज़्ज़त-ए-फ़राग़…
तक़लीफ़-ए-पर्दा-,
दारी-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र ग़ई…
मिर्ज़ा ग़ालिब
10694
वो याँर हो या महबूब मिरे,
या क़भी क़भी मिलनेवाले…
इक़ लज़्ज़त सबक़े मिलनेमें,
वो ज़ख़्म दिया या प्यार दियाँ…
उबैदुल्लाह अलीम
10695
लज़्ज़त-ए-ग़म बढ़ा दीज़िए,
आप फ़िर मुस्क़ुरा दीज़िए l
चाँद क़ब तक़ ग़हनमें रहें,
अब तो ज़ुल्फ़ें हटा दीज़िए ll