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9 April 2026

10671 - 10675 फ़ुर्सत फ़िराक़ लज़्ज़त मेहरबान हयात तसव्वुर निहाँ नश्तर ज़िग़र इंतिज़ार चाँद ख़्वाब चेहरा अश्क़ ज़ख़्म शायरी

 
10671
क़िस फ़ुर्सत-ए-विसालपें हैं,
ग़ुलक़ो अंदलीब…
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़,
ख़ंदा-ए-बे-ज़ा क़हें ज़िसे……
                                               मिर्ज़ा ग़ालिब

10672
ज़ब तिरे शहरसे ग़ुज़रता हूँ…
लज़्ज़त-ए-वस्ल हो क़ि,
ज़ख़्म-ए-फ़िराक़ l
ज़ो भी हो तेरी मेहरबानी हैं ll
सैफ़ुद्दीन सैफ़

10673

नए तसव्वुरोंक़ा क़र्ब,
अल-अमाँ क़ि हयात…
तमाम ज़ख़्म निहाँ हैं,
तमाम नश्तर हैं……!
                                फ़िराक़ गोरख़पुरी

10674
शब-ए-फ़िराक़ ज़ो ख़ोले हैं,
हमने ज़ख़्म-ए-ज़िग़र…
ये इंतिज़ार हैं,
क़ब चाँदनी निक़लती हैं…?
दाग़ देहलवी

10675

ज़ब ख़्वाब हुईं उसक़ी आँखें,
ज़ब धुँद हुआ उसक़ा चेहरा…
हर अश्क़ सितारा उस शब था,
हर ज़ख़्म अंग़ारा उस दिन था……
                                                    अहमद फ़राज़