10676
ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं,
दिल तुझक़ो क़ौन सँभालेग़ा…
ऐ मेरे बचपनक़े साथी,
मेरे साथ ही मर ज़ाना……
ज़ेब ग़ौरी
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ज़ो तेरी दीदने,
बख़्शे वहीं हैं ज़ख़्म बहुत
अब अपने दिलमें,
क़ोई हसरत-ए-नज़ारा नहीं
क़तील शिफ़ाई
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दिलसे उठते हुए शोलोंक़ो,
क़हाँ ले ज़ाएँ…
अपने हर ज़ख़्मक़ो,
पहलूमें छुपानेवाले……!
अख़्तर सईद ख़ान