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14 February 2026

10431 - 10435 समझ ताक़त तक़ाज़ा ज़ुल्फ़ सौदा आँख़ें दहर बादल तूफ़ां क़ामयाब महरूम हैराँ शौक़ दीद शायरी


10431
उड़ बैठे क़्या समझक़े,
भला तूर पर क़लीम ;
ताक़त हो दीदक़ी तो,
तक़ाज़ा क़रे क़ोई...

10432
टूटें वो सर ज़िसमें,
तेरी ज़ुल्फ़क़ा सौदा नहीं...
फ़ूटें वो आँख़ें क़ि ज़िनक़ो,
दीदक़ा लपक़ा नहीं.....
हक़ीर

10433
दहरक़ो देते हैं,
मुए दीद-ए-ग़िरियाँ हम ;
आख़िरी बादल हैं,
एक़ ग़ुज़रे हुए तूफ़ांक़े हम...!!

10434
मैं क़ामयाब-ए-दीद भी,
महरूम-ए-दीद भी...
ज़ल्वोंक़े इज़दिहामने,
हैराँ बना दिया......!!!
असग़र गोंडवी

10435
हो दीदक़ा ज़ो शौक़,
तो आँख़ोंक़ो बंद क़र l
हैं देखना यही क़ि,
न देख़ा क़रे क़ोई ll