12 November 2025

9991 - 9995 शख़्स ग़ुमान आराम सफ़र साथ रूह ज़वान आसमान तलब आरज़ू सफ़र हासिल मंज़िल शायरी

 

9991
हर शख़्सक़ो ग़ुमानक़ी,
मंज़िल नहीं हैं दूर...
ये तो बताइएक़ी,
पिता क़िसक़े पास हैं...!
                            बद्र वास्ती

9992
क़हाँ रह ज़ाए थक़क़र,
रह-नवर्द-ए-ग़म ख़ुदा ज़ाने l
हज़ारों मंज़िलें हैं,
मंज़िल-ए-आराम आने तक़ ll
मुमताज़ अहमद ख़ाँ ख़ुशतर खांडवी

9993
ग़र्म-ए-सफ़र हैं ग़र्म-ए-सफ़र,
रह मुड़ मुड़क़र मत पीछे देख़ l
एक़ दो मंज़िल साथ चलेग़ी,
पटक़े हुए क़दमोंक़ी चाप ll
                        अहसन शफ़ीक़

9994
उक़ाबी रूह ज़ब,
बेदार होती हैं ज़वानोंमें l
नज़र आती हैं उनक़ो,
अपनी मंज़िल आसमानोंमें !
अल्लामा इक़बाल

9995
रह-ए-तलबमें,
क़िसे आरज़ू-ए-मंज़िल हैं l
शुऊर हो तो सफ़र,
ख़ुद सफ़रक़ा हासिल हैं ll
                      ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

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