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चाहा हैं इसी रंग़में,
लैला-ए-वतनक़ो...
तड़पा हैं इसी तौरसे,
दिल उसक़ी लग़नमें...
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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उसक़े एक़ दीदारक़े लिए,
तड़पता हैं दिल,
आख़िर उसक़े ही नामसे,
तो धड़क़ता हैं दिल।
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आँख़ें तड़प रहीं हैं मिरी,
आँख़ें तड़प रहीं हैं मिरी,
क़ुछ ख़याल क़र l
बंद-ए-क़बाक़ो ख़ोल,
बंद-ए-क़बाक़ो ख़ोल,
बदनक़ो बहाल क़र ll
सलीम सिद्दीक़ी
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तड़प मेरी तरक़्क़ी क़र रहीं हैं,
ज़मीं टक़रा न ज़ाए आसमाँसे !
ज़लील मानिक़पूरी
सलीम सिद्दीक़ी
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दिख़ा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़,
अपनी चश्म-ए-पुर-नमक़ो
l
ज़ो तड़पाता हैं परवानेक़ो,
रुलवाता हैं शबनमक़ो
ll
अल्लामा इक़बाल
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तड़प मेरी तरक़्क़ी क़र रहीं हैं,
ज़मीं टक़रा न ज़ाए आसमाँसे !
ज़लील मानिक़पूरी