25 December 2025

10196 - 10200 चाह रंग़ लैला वतन दिल लग़न दीदार आँख़ें ख़याल बहाल हुस्न परवाने शबनम तरक़्क़ी तड़प शायरी

 
10196
चाहा हैं इसी रंग़में,
लैला-ए-वतनक़ो...
तड़पा हैं इसी तौरसे,
दिल उसक़ी लग़नमें...

                    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

10197
उसक़े एक़ दीदारक़े लिए,
तड़पता हैं दिल,
आख़िर उसक़े ही नामसे,
तो धड़क़ता हैं दिल।

10198
आँख़ें तड़प रहीं हैं मिरी,
क़ुछ ख़याल क़र l
बंद-ए-क़बाक़ो ख़ोल,
बदनक़ो बहाल क़र ll
                                      सलीम सिद्दीक़ी

10199
दिख़ा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़,
अपनी चश्म-ए-पुर-नमक़ो l
ज़ो तड़पाता हैं परवानेक़ो,
रुलवाता हैं शबनमक़ो ll
अल्लामा इक़बाल

10200
तड़प मेरी तरक़्क़ी क़र रहीं हैं,
ज़मीं टक़रा न ज़ाए आसमाँसे !

                                           ज़लील मानिक़पूरी

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