10191
ख़ुदाने सब्र क़रनेक़ी,
मुझे तौफ़ीक़ बख़्शी हैं l
अरे ज़ी भरक़े तड़पाओ,
शिक़ायत क़ौन क़रता हैं...?
10192
ये क़्या क़ि वो ज़ब चाहे,
मुझे छीन ले मुझसे l
अपने लिए वो शख़्स,
तड़पता भी तो देख़ूँ......
परवीन शाक़िर
10193
तुझे, शाख़-ए-ग़ुलसे,
तोड़ें ज़हेंनसीब तेरे...
तड़पते रह ग़ए,
ग़ुलज़ारमें रक़ीब तेरे।
10194
तस्क़ीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो,
सई-ए-क़रम फ़रमा भी ग़ए
इस सई-ए-क़रमक़ो क़्या क़हिए,
बहला भी ग़ए, तड़पा भी गए
असरार-उल-हक़ मज़ाज़
10195
शायर तो वो शख़्स होते हैं,
ज़ो दर्दक़ो भी तड़पा दीये क़रते हैं ll
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