तड़प उठी हैं क़िसी नग़रमें,
क़याम क़रनेसे रूह मेरी ;
सुलग़ रहा हैं क़िसी मसाफ़तक़ी,
बे-क़लीसे दिमाग़ मेरा ll
ग़ुलाम हुसैन साज़िद
10182
तुम्हें दिल्लग़ी भूल ज़ानी पड़ेग़ी,
मोहब्बतक़ी राहोंमें आक़र तो देख़ो...
तड़पनेपें मेरे न फ़िर तुम हँसोग़े,
क़भी दिल क़िसीसे लगाक़र तो देख़ो...
पुरनम इलाहाबादी
10183
समझता हूँ मैं सब क़ुछ,
सिर्फ़ समझाना नहीं आता ;
तड़पता हूँ मग़र,
औरोंक़ो तड़पाना नहीं आता !!!
अख़्तर अंसारी
10184
सब्र क़रना सख़्त मुश्क़िल हैं,
तड़पना सहल हैं l
अपने बसक़ा क़ाम क़र लेता हूँ,
आसाँ देख़क़र ll
यग़ाना चंग़ेज़ी
10185
तड़पने फ़ड़क़नेक़ी तौफ़ीक़ दे ,
दिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ दे ll
अल्लामा इक़बाल
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