4706
हर बार हमपर इल्जाम,
लगा
देते हो मोहब्बतका...
कभी खुदसे भी पुछा हैं
की,
तुम इतने हसीन
क्यों हो...!
4707
कोई इल्जाम रह गया
हो,
तो वो भी
दे दो...
पहले भी हम
बुरे थे,
अब थोड़े और सही.......
4708
फ़िसलती रेतसे,
सीख़ लो सबक़ ज़िन्दग़ीक़े l
ज़ोर अपनी ज़ग़ह होता हैं.
और नज़ाक़त अपनी ज़ग़ह...!
4709
इल्जाम लगाने वाले लोग,
मुझे बहुत पसंद
आते हैं l
क्योंकि
यही तो वह
लोग हैं,
जो
मेरे अंदरकी
कमी बताते हैं ll
4710
बेवजह सरहदोंपर,
इल्जाम
है बंटवारेका...
लोग मुद्दतोंसे एक
घरमें भी,
अलग अलग रहते हैं.......