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आग़ लग़ाना मेरी,
फ़ितरतमें नहीं हैं l
मेरी सादग़ीसे लोग़ ज़लें,
तो मेरा क़्या क़सूर l
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हजार गम मेरी,
फितरत नहीं बदल
सकते...
क्या करू मुझे
आदत हैं,
मुस्कुरानेकी.......
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ज़माना चाहता क्यों,
मेरी फ़ितरत बदल देना...
इसे क्यों ज़िद हैं आख़िर,
फूलको पत्थर बनानेकी.......
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मेरी फितरत ही,
कुछ ऐसी हैं
कि;
दर्द सहनेका,
लुत्फ़ उठाता हूँ मैं ll
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मैं आईना हूँ,
टूटना मेरी फितरत हैं...
इसलिए पत्थरोंसे मुझे,
कोई गिला नहीं.......