6491
हर कोई रखता हैं,
ख़बर ग़ैरोंके गुनाहोंकी...
अजब फितरत हैं,
कोई आईना नहीं रखता...!
6492
हजार गम मेरी,
फितरत नहीं बदल
सकते...
क्या करू मुझे
आदत हैं,
मुस्कुरानेकी.......
6493
ज़माना चाहता क्यों,
मेरी फ़ितरत बदल देना...
इसे क्यों ज़िद हैं आख़िर,
फूलको पत्थर बनानेकी.......
6494
मेरी फितरत ही,
कुछ ऐसी हैं
कि;
दर्द सहनेका,
लुत्फ़ उठाता हूँ मैं ll
6495
मैं आईना हूँ,
टूटना मेरी फितरत हैं...
इसलिए पत्थरोंसे मुझे,
कोई गिला नहीं.......
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