16 September 2020

6491 - 6495 ज़माना ख़बर गुनाह आग़ लग़ा क़सूर सादग़ी आदत गम दर्द फितरत शायरी

 

6491
आग़ लग़ाना मेरी,
फ़ितरतमें नहीं हैं l 
मेरी सादग़ीसे लोग़ ज़लें,
तो मेरा क़्या क़सूर l

6492
हजार गम मेरी,
फितरत नहीं बदल सकते...
क्या करू मुझे आदत हैं,
मुस्कुरानेकी.......

6493
ज़माना चाहता क्यों,
मेरी फ़ितरत बदल देना...
इसे क्यों ज़िद हैं आख़िर,
फूलको पत्थर बनानेकी.......

6494
मेरी फितरत ही,
कुछ ऐसी हैं कि;
दर्द सहनेका,
लुत्फ़ उठाता हूँ मैं ll

6495
मैं आईना हूँ,
टूटना मेरी फितरत हैं...
इसलिए पत्थरोंसे मुझे,
कोई गिला नहीं.......

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