2 September 2017

1686 - 1690 दिल जिन्दगी खुशकिस्मत तलाश पसंद ख़ामोश बात सन्नाटा महफ़िल नज़रिया वक्त गुज़ार शायरी


1686
खुशकिस्मत होते हैं वो जो,
तलाश बनते हैं किसीकी...
वरना पसंद तो कोईभी,
किसीको भी कर लेता हैं…

1687
कभी मेरी ख़ामोशियोंको,
ख़ामोशीसे सुनना,
क्या पता ये वो कह दे, जो,
मैं शब्दोंमें भी कह ना सकुं।
गुलझार

1688
उस दिलकी बस्तीमें आज,
अजीबसा सन्नाटा हैं इनकार
जिसमें कभी तेरी हर बातपर,
महफ़िल सज़ा करती थी...।

1689
तेरा नज़रिया मेरे नज़रियेसे अलग था,
शायद तुझे वक्त, गुज़ारना था
और मुझे जिन्दगी।

1690
हज़ारो फेरे लग़ाए थे,
उसक़े मोहल्लेमें…
क़ोई सिर्फ़ सात फेरे,
लग़ाक़र उसे उठा ले ग़़या……

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