4 October 2026

11441 - 11445 दिल मोहब्बत क़दम ग़म्माज़ ख़िराम मंसूब क़यामत निग़ाह ग़लत ज़ुनूँ ख़बर हर्फ़अंदाज़ शायरी

 
11441
तेरा ग़म्माज़ बना,
ख़ुद तिरा अंदाज़-ए-ख़िराम…
दिल न सँभला था तो,
क़दमोंक़ो सँभाला होता…!
                                 अहमद नदीम क़ासमी

11442
मंसूब मुझसे हैं,
ज़ो ब-अंदाज़-ए-दिल-नशीं ;
तेरी वो शाइ'री हैं,
मिरी शाइ'री नहीं……
ज़ोश मलीहाबादी

11443
दिलपें ऐ दोस्त,
क़यामत सी ग़ुज़र ज़ाती हैं…l
तुम निग़ाह-ए-ग़लत-अंदाज़से,
देख़ा न क़रो……ll
                                       शहज़ाद अहमद

11444
क़िस हर्फ़पें तूने ग़ोश-ए-लब,
ऐ ज़ान-ए-ज़हाँ ग़म्माज़ क़िया…
एलान-ए-ज़ुनूँ दिल वालोंने,
अबक़े ब-हज़ार-अंदाज़ क़िया…ll
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

11445
ता-देर न हो,
दिलभी ख़बर-दार-ए-मोहब्बत…
इक़ ये भी हैं,
अंदाज़-ए-फ़ुसूँ-क़ार-ए-मोहब्बत…!
                                                     ज़िग़र मुरादाबादी

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