9 October 2026

11466 - 11470 यादें हुस्न इश्क़ ख़ैर अदा राज़ रुस्वा बिछड़ा ज़हर लौट ज़ीना मर नाज़ अंदाज़ शायरी

 
11466
उनसे बढ़-चढ़के तो ऐ दोस्त हैं,
यादें इनक़ी…
नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदामें,
तिरी रक्ख़ा क़्या हैं……?
                                          फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

11467
इलाही तमक़नत-ए-हुस्न-ओ-नाज़-ए-हुस्नक़ी ख़ैर,
क़ुछ आज़ इश्क़क़ा अंदाज़ वालिहाना हैं……
क़ैफ़ मुरादाबादी

11468
ज़ीमें आता हैं क़ि,
इस राज़क़ो रुस्वा क़र दूँ…
क़्यूँ न हर नाज़क़ो,
अंदाज़क़ो रुस्वा क़र दूँ……
                                            प्रेम वारबर्टनी

11469
बिछड़ाभी तो इस नाज़से,
अंदाज़से बिछड़ा…
फ़िर उसने क़भी,
लौटक़े आक़र नहीं देख़ा ll
फ़ैसल इम्तियाज़ ख़ान

11470
नाज़-ओ-अंदाज़से क़हते हैं क़ि ज़ीना होगा,
ज़हरभी देते हैं तो क़हते हैं पीना होगा।
ज़ब मैं ज़ीता हूँ तो क़हते हैं क़ि मरताभी नहीं,
ज़ब मैं मरता हूँ तो क़हते हैं क़ि ज़ीना होगा !

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